प्राचीन भारत का इतिहास :-
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प्राचीन भारत का इतिहास : हड़प्पा सभ्यता एवं वैदिक समाज

  • हड़प्पा संस्कृति का उदय ताम्रपाषाणिक पृष्ठभूमि पर भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर भाग में सर्वप्रथम हुआ।
  • इस सभ्यता के संदर्भ में हमें प्रथम जानकारी ‘‘चाल्र्स मेमन’’ नामक अंग्रेज के विवरणों से मिलती है।
  • इसका नाम ‘हड़प्पा संस्कृति’ पड़ा क्योंकि इसका पता सबसे पहले 1921 में पाकिस्तान के पश्चिम पंजाब प्रान्त में अवस्थित ‘हड़प्पा’ के आधुनिक स्थल में चला।
  • वर्तमान पाकिस्तान स्थित ‘हड़प्पा’ तथा ‘मोहेंजोदड़ो’ का उत्खनन कार्य क्रमशः ‘श्री रायबहादुर दयाराम साहनी’ और ‘राखालदास बनर्जी’ द्वारा किया गया।
  • ‘हड़प्पा संस्कृति’ नामकरण ‘सर जॉन मार्शल’ ने किया।
  • ‘डा. व्हीलर’ ने इसे ‘सिन्धु घाटी सभ्यता’ नाम दिया। इसका फैलाव उत्तर में जम्मू से लेकर दक्षिण में नर्मदा के मुहाने तक और और पश्चिम में बलूचिस्तान के मकरान समुद्र तट से लेकर उत्तर पूर्व में मेरठ तक था।
  • हड़प्पा सभ्यता में दो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नगर थेः- पंजाब में ‘हड़प्पा’ और सिन्ध में ‘मोहेंजोदड़ो’ (अर्थात् प्रेतों का टीला)। दोनों पाकिस्तान में पड़ते हैं।
  • तीसरा नगर सिन्ध में ‘चन्हुदड़ो’ स्थल पर था और चौथा नगर गुजरात में ‘लोथल’ स्थल पर। पाँचवां नगर उत्तरी राजस्थान में ‘कालीबंगा’ व छठा नगर ‘बनवाली’ हरियाणा के हिसार जिले में था।
  • हड़प्पा संस्कृति की विशेषता थी इसकी नगर-योजना प्रणाली।
  • हड़प्पा और मोहेंजोदड़ो दोनों नगरों के अपने-अपने दुर्ग थे जहाँ शासक वर्ग का परिवार रहता था।
  • तदनुसार सड़कें एक दूसरे को समकोण बनाते हुए काटती थीं और नगर अनेक खंडों में विभाजित होता था.
  • बड़े-बड़े भवन हड़प्पा और मोहेंजोदड़ो दोनों की विशेषता है। दूसरा तो भवनों में और भी समृद्ध है।
  • मोहेंजोदड़ो का शायद सबसे महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल है विशाल स्नानागार, जिसका जलाशय दुर्ग के टीले में है।
  • हड़प्पा के दुर्ग में छह कोठार मिले हैं जो ईंटों के बने चबूतरों पर दो पाँतों में खड़ें हैं।
  • हड़प्पा संस्कृति के नगरों में पकी ईंटों का इस्तेमाल एक विशेष बात है, क्योंकि मिस्र के समकालीन भवनों में धूप में सूखी ईंटों का ही प्रयोग हुआ था।
  • हड़प्पा, पश्चिमी पंजाब के मोंटगोमरी जिला में स्थित है।
  • हड़प्पा के सामान्य आवास के दक्षिण से एक कब्रिस्तान मिला है। हड़प्पा से ताबूत शवाधान के साक्ष्य की प्राप्ति हुई है। लोथल से एक गोदी (Dockyard) की प्राप्ति हुई है।
  • लोथल से ‘युग्म शवाधान’ की प्राप्ति हुई है।
  • मोहेंजोदड़ो से एक ‘नर्तकी की मूर्ति’ भी मिली है। यह कांस्य निर्मित है।
  • मोहेंजोदड़ो से ‘योगी’ की मूर्ति प्राप्त हुई है।
  • स्वर्णकार चाँदी, सोना और रत्नों के आभूषण बनाते थे।
  • सिन्धु सभ्यता के लोग अरब सागर के तट पर जहाजरानी (नौचालन) करते थे।
  • सिन्धु सभ्यता के लोग चक्र के उपयोगों से परिचित थे, और हड़प्पा में ठोस पहियों वाली गाडि़याँ प्रचलित थीं। उनके नगरों का व्यापार दजला-फरात प्रदेश के नगरों के साथ चलता था।
  • बहुत से हड़प्पाई सीलें मेसोपोटामिया की खुदाई में निकली हैं।
  • ‘दिलमुन’ की पहचान शायद फारस की खाड़ी के ‘बहरैन’ से की जा सकती है।
  • मेसोपोटामिया के पुरालेखों में दो मध्यवर्ती व्यापार केन्द्रों का उल्लेख मिलता है- ‘दिलमुन’ और ‘माकन’। दोनों मेसोपोटामिया और मेलुहा के बीच में है।
  • हड़प्पा में पकी मिट्टी की स्त्री-मूर्तिकाएँ भारी संख्या में मिली हैं।
  • एक मूर्तिका में स्त्री के गर्भ से निकलता एक पौधा दिखाया गया है। यह सम्भवतः पृथ्वी देवी की प्रतिमा है।
  • हड़प्पाई लोग धरती को उर्वरता की देवी समझते थे और इसकी पूजा उसी तरह करते थे जिस
  • तरह मिस्र के लोग नील नदी की देवी आइसिस की पूजा करते थे।
  • पुरुष देवता एक सील पर चित्रित किया गया है। उसके सिर पर तीन सींग हैं। उसे एक योगी की ध्यान मुद्रा में एक टांग पर दूसरी टांग डाले बैठा (पद्मासन लगाए) दिखाया गया है। उसके चारों ओर एक हाथी, एक बाघ और एक गैंडा है, आसन के नीचे एक भैंसा है और पाँवों पर दो हिरण हैं। यह मोहेंजोदड़ो से प्राप्त हुई है। यह सील (मृन्मुद्रा) पौराणिक पशुपति महादेव की छवि से मिलती है।
  • हड़प्पा काल में पशु-पूजा का भी प्रचलन था। इनमें सबसे महत्त्व का है कूबड़ वाला साँड।

वैदिक संस्कृति

  • ‘आर्य’ शब्द वस्तुतः एक ‘भाषा समूह’ को सूचित करता है।
  • वैदिक सभ्यता एक ग्रामीण सभ्यता थी।
  • ‘ऋग्वेद’ आर्यों का प्राचीनतम एवं पवित्र ग्रन्थ है।
  • ऋग्वेद में देवताओं की स्तुतियों का उल्लेख है।
  • ऋग्वेद में कुल 10 मंडल हैं जिनमें 2 से 7 तक प्राचीनतम अंश माने जाते हैं।
  • प्रथम एवं दशम मंडल सबसे बाद में जोड़े माने जाते हैं।
  • ऋग्वेद की अनेक बातें ईरानी भाषा के प्राचीनतम ग्रंथ ‘जेन्दावस्ता’ से मिलती हैं।
  • सिन्धु सभ्यता के विपरीत वैदिक सभ्यता मूलतः ग्रामीण थी। आर्यों का आरिम्भक जीवन मुख्यतः पशुचारण का था, कृषि उनका गौण धन्धा था।
  • ऋग्वेद भारत-यूरोपीय भाषाओं का सबसे पुराना निदर्श है इसमें अग्नि, इन्द्र, मित्रा, वरूण आदि देवताओं की स्तुतियाँ संग्रहीत हैं।
  • आर्यों की आरंभिक इतिहास की जानकारी का मुख्य स्रोत ऋग्वेद है।
  • ऋग्वैदिक काल की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नदी ‘सिन्धु’ का वर्णन कई बार आया है। ऋग्वैदिक काल की दूसरी सर्वाधिक पवित्रा नदी ‘सरस्वती’ थी। ऋग्वेद में सरस्वती को ‘नदीतमा’ (नदियों में प्रमुख) कहा गया है।
  • ऋग्वेद में आर्य निवास स्थल के लए सर्वत्रा ‘सप्त सैन्धव’ शब्द का प्रयोग किया गया है।
  • पितृसत्तात्मक परिवार आर्यों के कबीलाई समाज की बुनियादी इकाई थी।
  • ऋग्वेद में आर्यों के पाँच कबीले के होने की वजह से उन्हें पंचजन्य कहा गया है। ये थे -अनु,
  • द्रुहय, पुरू, तुर्वश तथा यदु।
  • ग्राम, विश और जन ये उच्चतर इकाई थे। ग्राम सम्भवतः कई परिवारों के समूह को कहते थे। ‘ग्रामीणी’ ग्राम का प्रधान होता था।
  • विश कई गाँवों का समूह था इसका प्रधान ‘विशपति’ कहलाता था। अनेक विशों का समूह ‘जन’ होता था। जन के अधिपति को जनपति या राजा कहा जाता था। देश या राज्य के लिए ‘राष्ट्र’ शब्द आया है।
  • ऋग्वैदिक काल में राजा का पद आनुवंशिक हो चुका था। फिर भी राजा के हाथ में असीमित अधिकार नहीं था। कबीले की आम सभा ‘समिति’ कहलाती थी, जो अपने राजा को चुनती थी।
  • राजा को कबीले का संरक्षक (गोप्ता जनस्य) कहा गया है।
  • ऋग्वेद में सभा, समिति, दिय तथा गण जैसे अनेक कबीलाई परिषदों का उल्लेख है। ये संगठन (परिषदें) विचारात्मक सैनिक एवं धार्मिक कार्य देखते थे।
  • ऋग्वेद काल में महिलाएँ भी सभा एवं विदथ में भाग लेती थीं।
  • इस काल में राजा की कोई नियमित सेना नहीं थी। युद्ध के समय संगठित की गई सेना को ‘नागरिक सेना’ कहते थे।
  • ऋग्वैदिक काल में राजा भूमि का स्वामी नहीं था। वस्तुतः वह युद्ध का स्वामी था।
  • ऋग्वेद में ‘इन्द्र’ को ‘पुरन्दर’ कहा गया है।
  • ‘भरत’ और ‘त्रित्सु’ दोनों आर्यों के शासक वंश थे और पुरोहित वशिष्ठ इन दोनों वंशों के सम्पर्क में थे।
  • ऋग्वेद में सेनानी (सेनापति), पुरोहित तथा ग्रामणी नामक शासकीय पदाधिकारी का उल्लेख मिलता है जो राजा की सहायता के लिए होते थे। प्रायः पुरोहित का पद वंशानुगत होता था।
  • ‘ब्राजपति’ गोचर भूमि का अधिकारी एवं ‘कुलप’ परिवार का मुखिया होता था। ऋग्वेद में ‘सभा’, ‘समिति’, ‘विदथ’ तथा ‘गण’ जैसे अनेक कबीलाई परिषदों का उल्लेख है। ये संगठन (परिषदें) विचारात्मक सैनिक एवं धार्मिक कार्य देखते थे।
  • ऋग्वैदिक काल में महिलाएँ भी सभा एवं विदथ में भाग लेती थीं। ‘विदथ’ – यह आर्यों की सर्वाधिक प्राचीन संस्था थी। ‘सभा’ – यह वृद्ध (श्रेष्ठ) एवं अभिजात (संभ्रान्त) लोगों की संस्था थी। ‘समिति’ – यह केन्द्रीय राजनीतिक संस्था (सामान्य जनता की प्रतिनिधि सभा) थी।
  • समिति राजा की नियुक्ति, पदच्युत करने व उस पर नियंत्राण रखती थी। अथर्ववेद में ‘सभा एवं समिति’ को प्रजापति की दो पुत्रियों के समान माना गया है।
  • आर्य समाज पितृसत्तात्मक था, परन्तु नारी को मातृरूप में पर्याप्त सम्मान प्राप्त था। पुत्र ही पैतृक सम्पत्ति का उत्तराधिकरी होता था तथा उसमें पुत्री को कोई अधिकार नहीं था। पत्नी अपने पति के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में प्रमुख रूप से भाग लेती थी।
  • ऋग्वेद में ‘वर्ण’ शब्द रंग के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। आर्य लोग गौर वर्ण के थे।
  • शूद्र शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद के दशवें मण्डल के पुरुष सूक्त में मिलता है। ऋग्वेद का नौवां मण्डल सोम देवता को समर्पित है।

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