खड़ीबोली का विकास:-

इस लेख में जहाँ एक ओर काव्यभाषा का विकासात्मक और प्रतीतिपरक मूल्यात्मक विवेचन किया गया है वहां दूसरी ओर संवेदना या जनता की चित्तवृत्ति में होने वाले परिवर्तनों के कारण खड़ीबोली के काव्यभाषा के रूप में विकास का भी अत्यंत व्यवस्थित वर्णन है। इस दृष्टि से यह लेख दोहरी अर्थवत्ता रखता है। संवेदना के बदलाव के कारक भाषा के भी बदलाव के कारक होते हैं। ‘नई चाल’ में ढलने के पूर्व खड़ी बोली ने कई मंज़िलें पार कीं और धर्म, राजनीति, शिक्षा, प्रचार-प्रसार तथा छापेखाने आदि के माध्यम से संवाद और विमर्श की भाषा के रूप में गद्य में विकसित हुई। गद्य भाषा के रूप में ब्रजभाषा की विफलता और खड़ीबोली की सफलता का यह इतिहास काफी रोचक और हिन्दी साहित्य तथा हिन्दी जाति की प्रतिष्ठा की दृष्टि से अत्यंत सार्थक है।
 
खड़ीबोली काव्य आन्दोलन और स्वच्छंदतावादी काव्यधारा के दौर में छायावाद के पूर्व खड़ीबोली किस प्रकार शैशवावस्था से किशोरावस्था को प्राप्त कर रही थी इसका संकेत  श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी, हरिऔध मैथिलीशरण गुप्त और रामचरित उपाध्याय आदि की कृतियों और महावीर छायावाद द्विवेदी की संपादन क्षमता सामर्थ्य और अनुशासन प्रियता तथा खड़ीबोली के मानकीकरण के प्रयत्नों के विवेचन क्रम में अनेक उदाहरणों मे मिलता है। छायावाद को जिस प्रकार की काव्यभाषा मिली थी उसे इन कवियों ने, और अधिक भाव-विचार-सम्प्रेषणक्षम बनाया है। ब्रजभाषा की कोमलता और मसृणता को खड़ी बोली में अन्तरिम करने के प्रयत्न में कविता की महत्वपूर्ण भूमिका है यह छायावाद के माध्यम से ही समझा जा सकता है। छायावाद ने हिन्दी में लाक्षणिकता संकेतपरकता और चित्रात्मकता को जिस प्रकार सूक्ष्म अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त करते हुए भाषा की अन्तर्निहित शक्ति के स्रोत का उद्धाटन किया यह भाषा, काव्य, चिंतन और प्रगति अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
 
 यह लेख इस अर्थ में नयी स्थापना करता है। और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की स्थापनाओं का विनम्रतापूर्वक सतर्क ढंग से प्रत्याख्यान भी करता है। शोधपरकता और विश्लेषण क्षमता का यह लक्षण होता है कि वह उस संभावना को भी रेखांकित करती चलती है जिससे महत्त्वपूर्ण कृतियाँ विकसित होती हैं। छायावादी कवियों की कृतियों की काव्यभाषा के मूल्यांकन में इसका संकेत बराबर मिलता है। छायावाद के कवि व्यक्तित्व और उनकी काव्यभाषा का क्रमिक विकास कैसे हुआ इस लेख में कालक्रमिक और मूल्यक्रमिक ढंग से प्रतिपादित किया गया है। छायावाद की प्रारंभिक कृतियों से अनेक उदाहरणों द्वारा यह सिद्ध किया जा सकता है कि अन्तत: एक बड़े कवि की खोज, भाषा की ही खोज होती है। मेरा मानना है इस लेख के द्वारा केवल छायावाद और छायावाद की काव्यभाषा क्षमता को ही नहीं समझा जा सकता है बल्कि खड़ीबोली की संभावना को भी रेखांकित किया जा सकता है।
 
खड़ीबोली के बीज प्राचीन काल से ही सिद्धों और नाथों की रचनाओं में मिलने लगते हैं किन्तु आधुनिक काल से पूर्व यह परम्परा मिश्रित रूप में ही मिलती है। इस प्रकार खड़ीबोली का इतिहास यद्यपि पुराना है, लेकिन उसके काव्यभाषा बनने और काव्यभाषा के रूप में पूर्ण स्वयत्तता प्राप्त करने का इतिहास अपेक्षाकृत आधुनिक है। बढ़ती हुई राष्ट्रीयता की भावना जहाँ एक ओर हिन्दी कविता को मध्यकालीन भक्ति और श्रृंगार से अलगाती है, वहीं उससे जुड़ी खड़ीबोली को काव्यभाषा के रूप में स्वीकृति मिलती है। आधुनिक काल से पूर्व गद्य की परम्परा नहीं के बराबर थी, साथ ही हमारा अधिकांश साहित्य ब्रजभाषा में मिलता है। इस प्रकार खड़ीबोली की प्रतिष्ठा और गद्य की विभिन्न विधाओं का विकास-ये दो महत्त्वपूर्ण बदलाव आधुनिक काल में दिखाई देते हैं। यह रोचक तथ्य है कि गद्यभाषा के रूप में खडी़बोली की प्रतिष्ठा अत्यन्त सहज रूप में हो गई किन्तु काव्यजगत में उसके प्रयोग का एक लम्बा इतिहास है। भारतेन्दु युग में जबकि गद्यभाषा के रूप में खड़ीबोली पूर्णत: प्रतिष्ठित हो गई थी, काव्य जगत् में ब्रजभाषा का ही एकाधिकार रहा। भाषा का यह द्वैत भारतेन्दु के बाद खड़ीबोली काव्यान्दोलन को जन्म देता है और द्विवेदी युग में महावीर छायावाद द्विवेदी के प्रयत्नों से काव्यभाषा के रूप में उसे स्वीकृति मिलती है।
 
 चूँकि आधुनिक काव्य का आरम्भ ब्रजभाषा से होता है, अत: आरम्भिक खड़ीबोली काव्य पर ब्रजभाषा का प्रभाव भी स्वाभाविक था। पं. श्रीधर पाठक से लेकर अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त, नाथूराम शंकर शर्मा, रायदेवी छायावाद पूर्ण और लोचन प्रसाद पाण्डेय आदि खड़ीबोली के छोटे-बड़े कवि रचनाकारों के साथ स्वयं महावीर छायावाद द्विवेदी की आरम्भिक खड़ीबोली रचनाएँ ब्रजभाषा के प्रभाव से एकदम अछूती नहीं है। खड़ीबोली रचनाएँ ब्रजभाषा के संस्कार से मुक्त कर व्यवस्थित करने के प्रयास में द्विवेदी युग में जो खड़ीबोली आती है वह इतिवृत्तात्मकता का  संस्कार लिये आती है और इस इतिवृत्तात्मकता से मुक्ति छायावाद की काव्यभाषा को जन्म देता है। काव्यभाषा के रूप में खड़ीबोली की इस विकास प्रक्रिया का विश्लेषण प्रस्तुत शोघ प्रबन्ध का एक पक्ष है।
 
आधुनिक खड़ीबोली काव्यभाषा का यह विकास क्रम छायावाद के काव्य में सर्वाधिक स्पष्ट होता है। छायावाद के कवि पहले ब्रजभाषा में लिखते थे, अत: उनकी आरम्भिक खड़ीबोली रचनाओं पर ब्रजभाषा का प्रभाव है। ‘इन्दु’ में समय-समय पर प्रकाशित प्रसाद की ब्रजभाषा कविताएँ ‘चित्राधार’ में संकलित हुई। ब्रजभाषा में लिखा गया उनका कथाकाव्य ‘प्रेमपथिक’ आठ वर्ष बाद खड़ीबोली में लिखा गया। ‘काननकुसुम’ की खड़ी बोली रचनाओं पर भी एक ओर ब्रजभाषा का प्रभाव है तो दूसरी ओर अधिकांश कविताओं की शैली इतिवृत्तात्मक है। इसी प्रकार ‘झरना’ की अनेक कविताएँ जबकि छायावाद की प्रवृत्तियां सबसे पहले झरना में दिखाई दीं द्विवेदीयुगीन इतिवृत्तात्मकता से मुक्त नहीं है। ‘झरना’ के बाद ‘आंसू’, ‘लहर’ और ‘कामायनी’ कवि की तीन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृतियाँ छायावाद का प्रतिनिधित्व करती हैं। छायावाद की रचनाओं के इस क्रमिक विकास का अध्ययन खड़ीबोली काव्यभाषा के संदर्भ में और भी प्रासंगिक हो जाता है। काव्यभाषा के रूप में खड़ीबोली की विकास प्रक्रिया के विश्लेषण के बाद इस विकास क्रम में छायावाद-काव्य का अध्ययन नितांत आवश्यक है जो नि:सन्देह पूर्व पक्ष से अभिन्न रूप में सम्पृक्त है अथवा यों कहा जा सकता है जिसका विकास पूर्व पक्ष की पृष्ठभूमि में होता है।
 
 खड़ीबोली से पूर्व ब्रजभाषा की समृद्ध काव्य परम्परा थी। पूर्व मध्यकाल और उत्तर मध्यकाल में काव्यभाषा के पद पर एकाधिकार रखने वाली ब्रजभाषा को पदच्युत कर काव्यभाषा के रूप में खड़ीबोली की प्रतिष्ठा अनायास और अप्रत्याशित नहीं थी। इसके विकास के पीछे अनेक कारण थे। आधुनिक युग में बदलती हुई परिस्थितियाँ किस प्रकार बदली हुई उन परिस्थितियों का विवेचन प्रथम अध्याय के अन्तर्गत पृष्ठभूमि के रूप में किया गया है।
 
खड़ीबोली के प्रयोग की परम्परा यद्यपि प्राचीन है किन्तु प्रस्तुत अध्ययन आधुनिक खड़ीबोली काव्यभाषा से सम्बन्धित है। भारतेन्दु युग में गद्यभाषा के रूप में खड़ीबोली की प्रतिष्ठा किन्तु काव्य जगत में ब्रजभाषा का प्रयोग फिर महावीर प्रसाद द्विवेदी का आगमन और खड़ीबोली को ब्रजभाषा तथा अन्य प्रान्तीय शब्दों के प्रभाव से मुक्त कर व्याकरणबद्ध करना, अन्तत: व्यवस्था के इस क्रम में द्विवेदी युगीन इतिवृत्तात्मकता से मुक्ति का संकेत और छायावाद का आरम्भ-काव्यभाषा के रूप में खड़ीबोली के इस पूरे विकास को दर्शाता है।
 
प्रसाद के पहले खड़ीबोली काव्य संग्रह ‘काननकुसुम’ में संकलित ‘प्रथम प्रभात’ कई अर्थों में द्विवेदीयुग की इतिवृत्तात्मक शैली से अलग नई काव्य क्षमता का संकेत देती है जिसका विकास आगे चलकर छायावाद में होता है। एक ओर मैथिलीशरण गुप्त और मुकुटधर पाण्डेय में छायावाद का पूर्वाभास मिलने लगता है, तो दूसरी ओर निराला की ‘जुही की कली’ और पंत के ‘पल्लव’ में यह नई काव्य क्षमता खड़ीबोली को नया स्वर देती है। द्विवेदीयुग की इतिवृत्तात्मकता से छायावाद की चित्रात्मकता और बिम्ब क्षमता का काव्यभाषिक विश्लेषण तृतीय अध्याय के अन्तर्गत किया गया है।
 
प्रसाद पहले कवि है जिनकी रचनाओं में छायावाद की प्रवृत्तियाँ दिखाई दीं। ‘चित्राधार’ से लेकर ‘कामायनी’ तक छायावाद की काव्यभाषा का विकास आधुनिक खड़ीबोली काव्यभाषा के विकास क्रम को दर्शाता है। ब्रजभाषा से खड़ीबोली में लिखने का प्रयास और प्रयास की इस प्रक्रिया में उनकी आरम्भिक खड़ीबोली रचनाओं पर ब्रजभाषा का प्रभाव, साथ ही द्विवेदीयुग की इतिवृत्तात्मक शैली का संस्कार स्पष्टत: देखा जा सकता है। आगे चलकर ‘जुही की कली’  ‘पल्लव’ ‘आँसू’ ‘लहर’ और ‘कामायनी’ में छायावाद की काव्यभाषा का विकास दिखाई देता है। छायावाद की काव्यभाषा का यह विवेचन काव्यभाषा के सैद्धान्तिक पक्ष की अपेक्षा व्यावहारिक धरातल पर अधिक है। छायावाद के रूप में खड़ीबोली को अपना पूर्ण वैभव प्राप्त होता है। महाकाव्य के नूतन कलेवर में कामायनी न केवल अपने समय की बल्कि हिन्दी काव्य जगत की महानतम उपलब्धि के रूप में सामने आती है। ‘आँसू’ की सूक्ष्म प्रबन्ध कल्पना और ‘लहर’ की गीतसृष्टि खड़ीबोली काव्य में शिल्प के नये आयाम जोड़ती है। आधुनिक खड़ीबोली काव्यभाषा के विकास में छायावाद के इस योगदान सर्वविदित है।
 
 
आधुनिक युग में खड़ीबोली की संवर्धक शक्तियाँ और काव्यभाषा के रूप में उसकी स्वीकृति :-
 
१.आधुनिक काल: भाषा और संवेदना का बदलाव :-
 
खड़ीबोली के बीज यद्यपि सिद्धों और नाथों की रचनाओं में आदिकाल से ही मिलने लगते हैं किन्तु आधुनिक काल से पूर्व तक खड़ीबोली की यह परम्परा मिश्रित रूप में मिलती है। आधुनिक काल भाषा और संवेदना दोनों ही दृष्टियों से परिवर्तन का काल है। बढ़ती हुई राष्ट्रीयता की भावना जहाँ एक ओर हिन्दी कविता को मध्यकालीन भक्ति और श्रृंगार से अलगाती है, वहीं उससे जुड़ी खड़ीबोली को काव्यभाषा के रूप में स्वीकृति मिलती है।
 
२.गद्य भाषा के रूप में खड़ीबोली का विकास :-
 
आधुनिक काल से पूर्व गद्य की परम्परा नहीं के बराबर थी, साथ ही हमारा अधिकांश साहित्य ब्रजभाषा में मिलता है। इस प्रकार खड़ीबोली की प्रतिष्ठा और गद्य की विभिन्न विधाओं का विकास-ये दो महत्त्वपूर्ण बदलाव आधुनिक काल में दिखाई देते हैं और ये दोनों एक दूसरे के पूरक भी हैं। हम देखते हैं कि आधुनिक काल में खड़ीबोली का आगमन गद्य भाषा के रूप में होता है। यह रोचक है जबकि अधिकांश भाषाओं में विकास का क्रम काव्य से गद्य की ओर गतिमान होता है, खड़ीबोली में विकास का यह क्रम उलट जाता है। आधुनिक हिन्दी काव्यभाषा के विकास क्रम में मैथिलीशरण गुप्त के योगदान की चर्चा के प्रसंग में डा. नामवर सिंह ने खड़ीबोली हिन्दी के इस वैशिष्ट्य और अपवाद को ठीक ही पहचाना है, ‘‘पहले काव्य और फिर गद्य। विकास का यह क्रम अधिकांश भाषाओं में मिला है। नहीं मिलता तो खड़ी बोली हिन्दी में। खड़ी बोली हिन्दी के साहित्य का आरम्भ ही गद्य से हुआ इस मामले में वह आदमी अपनी संगोतिया उर्दू से भी भिन्न हैं।”1
 
३.पुनर्जागरण, वैचारिक जागृति और गद्य का विकास : अन्तर्सम्बन्ध :-
 
इस विपरीत विकास क्रम में हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल जिसका आरम्भ भारतेन्दु के रचनाकाल के साथ माना जाता है हिन्दी गद्य के विकास का काल भी है। भारतेन्दु से पूर्व रीतिकाल के सामन्तीय दरबारी परिवेश में चमत्कार अतिशयोक्ति और श्रृंगारपरक साहित्य की ही प्रधानता रही, जनजीवन और जनचेतना से विमुख रहने के कारण गद्य का विकास प्राय: अवरुद्ध रहा। किन्तु उन्नीसवीं शताब्दी में पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के सम्पर्क से जो पुनर्जागरण आया, उसका सीधा प्रभाव साहित्य पर पड़ा। राजा राममोहनराय, केशवचन्द्र सेन, दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानन्द इस पुनर्जागरण के सूत्रधार बने और इस पुनर्जागरण से उत्पन्न वैचारिक जागृति का साहित्य में प्रतिफलन रीतिकालीन दरबारी श्रृंगारिकता से अलग आधुनिक सामाजिक चेतना के साथ हुआ। जनजीवन की इस अभिव्यक्ति के लिए गद्य अनिवार्य आवश्यकता बन गई और खड़ीबोली ने जो अपने ठेठ रूप में देख के कई भागों में बोली जाती थी और उन्नीसवीं शती तक उत्तर भारत की शिष्ट भाषा हो चुकी थी, गद्य के क्षेत्र में सहज ढंग से प्रवेश किया।
 
४.खड़ीबोली के विकास में फोर्ट विलियम कॉलेज की भूमिका :-
 
गद्य के क्षेत्र में, खड़ीबोली की प्रतिष्ठा ने काव्यजगत में उसके प्रयोग की पीठिका तैयार की, यद्यपि उसकी स्वीकृति लम्बे अन्तराल के बाद, आधुनिकता का एक चरण बीतने के साथ हुई। आधुनिक काल में खड़ी बोली के आरम्भिक प्रयोग के संबंध में डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं, जिस समय रीतिकाल के अंतिम प्रसिद्ध कवि पद्माकर ब्रजभाषा का परिष्कार ठेठ हिन्दी क्षेत्र में रहकर अपने कवित्त-सवैयों में कह रहे हैं, उसी समय सुदूर राजधानी कलकत्ते में हिन्दी गद्य के साथ नये प्रयोग चल रहे हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुवाद या तत्सम्बन्धी वृत्तान्तों के रूप में कुछ पुराना ब्रजभाषा या खड़ीबोली हिन्दी गद्य का रूप अभी तक मिलता था, पर व्यावहारिक उद्देश्यों के लिये नियोजित गद्य का सजग रूप में प्रयोग यहाँ से आरम्भ होता है। स्पष्ट ही ये नये प्रयोग 1800 ई. में संस्थापित फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. जॉन वौर्थविक गिलक्राइस्ट द्वारा हिन्दी/हिन्दुस्तानी गद्य में लिखवाई गई लेखों के रूप में थे। इन लेखों में लल्लू लाल की रचना ‘प्रेमसागर’ और सदल मिश्र की रचना ‘चन्द्रावती’ या ‘नासिकेतोपाख्यान’ विशेष महत्त्वपूर्ण है। संवत् 1860 अर्थात् सन् 1803 ई. में लिखी गई इन दोनों ही रचनाओं की भूमिका में खड़ीबोली के आरम्भिक प्रयोग का संकेत क्रमश: यों मिलता है-‘श्रीयुक्त गुनगाहक गुनियन सुखदायक जान गिलकिरिस्त महाशय की आज्ञा से संवत् 1860 में लल्लूजी कवि ब्राह्मण गुजराती सहस्र अवदीच आगरे वाले ने विसका सार ले यामिनी भाषा छोड़ दिल्ली आगरे की खड़ीबोली में कह नाम प्रेमसागर धरा।’

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