सबसे बड़ा तिरंगा :-

10 मार्च 2014 को दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क में देश का सबसे बड़ा तिरंगा फहराया गया
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60 फुट चौड़े और 90 फुट लंबे तिरंगे को 207 फुट ऊंचे पोल पर कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल ने फहराया। झंडे का वजन 35 किलोग्राम है। फ्लैग फाउंडेशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में जिंदल ने कहा, ‘मैंने भारत का सबसे बड़ा झंडा फहराने का सपना देखा था। सरकारी विभागों से अनुमति मिलने में देरी के कारण सात साल बाद यह सपना पूरा हुआ।’
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21 फीट लंबाई और 14 फीट चौड़ाई के झंडे पूरे देश में केवल तीन किलों के ऊपर फहराए जाते हैं… मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में स्थित किला उनमें से एक है। इसके अतरिक्त कर्नाटक का नारगुंड किले और महाराष्ट्र का पनहाला किले पर भी सबसे लम्बे झंडे को फहराया जाता है। भारत में सालाना लगभग चार करोड़ झंडे बिकते हैं। भारत में सबसे बड़ा झंडा (6.3 by 4.2 मी.) राज्य प्रशासनिक मुख्यालय, महाराष्ट्र के मंत्रालय भवन से फहराया जाता है।
स्वतंत्रता दिवस पर केवल कागज से बने राष्ट्रीय ध्वज का प्रयोग हो :- भारतीय ध्वज संहिता के प्रावधान के अनुरूप नागरिकों एवं बच्चों से शासन की अपील है कि वे स्वतंत्रता दिवस पर केवल कागज के बने राष्ट्रीय ध्वज का ही उपयोग करें।  साथ ही कागज के झंडों को समारोह संपन्न होने के बाद न विकृत किया जाए और न ही जमीन पर फेंका जाए। ऐसे झंडों का निपटान उनकी मर्यादा के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।  आमजन से आग्रह है कि वे स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्लास्टिक से बने झंडों का उपयोग बिलकुल ही न करें, क्योंकि प्लास्टिक से बने झंडे लंबे समय तक नष्ट नहीं होते हैं और जैविक रूप से अपघट्य न होने के कारण ये वातावरण के लिए हानिकारक होते हैं।
कैसे रचा गया झंडा गीत… विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा :-
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झंडा गीत को 1938 के कांग्रेस अधिवेशन में स्वीकार किया गया था। इस गीत की रचना करने वाले श्यामलाल गुप्त पार्षद कानपुर में नरवल के रहने वाले थे। उनका जन्म 16 सितंबर 1893 में हुआ था। गरीबी में भी उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की थी। उनमें देशभक्ति का जज्बा था, जिसे वह अपनी कविताओं में व्यक्त करते थे।

कांग्रेस का सक्रिय कार्यकर्ता रहने के बाद वह 1923 में फतेहपुर के जिला कांग्रेस अध्यक्ष बने। वह सचिव नाम का अखबार भी निकालते थे। जब यह लगभग तय हो गया था कि अब आजादी मिलने ही वाली है, उस वक्त कांग्रेस ने देश के झंडे (तिरंगा) का चयन कर लिया था। लेकिन एक झंडा गीत की जरूरत महसूस की जा रही थी।

इधर, गणेश शंकर विद्यार्थी पार्षद जी के काव्य कौशल के कायल थे। विद्यार्थी जी ने पार्षद जी से झंडा गीत लिखने का अनुरोध किया। पार्षद जी कई दिनों तक कोशिश करते रहे, पर वह झंडा गीत नहीं लिख पाए। जब विद्यार्थीजी ने पार्षदजी से साफ-साफ कह दिया कि मुझे हर हाल में कल सुबह तक झंडा गीत चाहिए, तो वह रात में कागज कलम लेकर बैठ गए।

आधी रात तक उन्होंने झंडे पर एक गीत तो लिखा, लेकिन वह उन्हें जमा नहीं। निराश होकर दो बजे जब वह सोने के लिए लेटे, अचानक उनके भीतर भाव उमडने लगे। वह उठकर लिखने बैठ गए। पार्षद जी को लगा जैसे कि कलम अपने आप चल रही हो और भारत माता उनसे गीत लिखा रही हों। यह गीत था- विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। यह गीत लिखकर उन्हें बहुत संतोष मिला।

सुबह होते ही पार्षद जी ने यह गीत विद्यार्थी जी को भेज दिया, जो उन्हें बहुत पसंद आया। जब यह गीत महात्मा गांधी के पास गया, तो उन्होंने गीत को छोटा करने को कहा। आखिर में, 1938 में कांग्रेस के अधिवेशन में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इसे देश के झंडा गीत की स्वीकृति दे दी।

 यह हरिपुरा का ऐतिहासिक अधिवेशन था। नेताजी ने झंडारोहण किया और वहां मौजूद करीब पांच हजार लोगों ने झंडागीत को एक सुर में गाया।

झण्डा ऊँचा रहे हमारा
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा – 2
झण्डा ऊँचा रहे हमारा
सदा शक्ती बरसाने वाला
प्रेम सुधा सरसाने वाला
वीरों को हर्षाने वाला
मातृ भूमी का तन मन सारा – 2
झण्डा ऊँचा रहे हमारा …
आओ प्यारे वीरों आओ
देश धर्म पर बलि-बलि जाओ
एक साथ सब मिल कर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा
झण्डा ऊँचा रहे हमारा …
शान न इसकी जाने पाये
चाहे जान भले ही जाये
सत्य की विजयी कर दिखलाएं
तब होए प्रण पूर्ण हमारा – 2
झण्डा ऊँचा रहे हमारा …
दिसंबर 2009- रात में भी फहराया जा सकेगा तिरंगा… सरकार ने राष्ट्रीय ध्वज को अब रात में भी फहराने की अनुमति दे दी है।  कांग्रेस सांसद एवं जानेमाने उद्योगपति नवीन जिंदल ने जून 2009 में केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर यह प्रस्ताव किया था कि देश में रात को भी विशाल ध्वज दंड पर राष्ट्रीय ध्वज यानी तिरंगा फहराने की अनुमति दी जाए। गृह मंत्रालय ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में जिंदल के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए कहा कि प्रस्ताव को पूरी तरह से पढ़ने व समझने के पश्चात गृह मंत्रालय ने कहा है कि जिंदल को देश में राष्ट्रीय ध्वज रात को भी विशाल ध्वज दंड पर फहराने के लिए अनुमति देता है।
सबसे ऊंचा राष्ट्रीय ध्वज… जिंदल ने कैथल और लाडवा (कुरुक्षेत्र), हिसार व कुरुक्षेत्र में देश के सबसे ऊंचे राष्ट्रीय ध्वज को फहराया है। यह राष्ट्रीय ध्वज 206 फुट ऊंचा है और इसकी चौड़ाई 48 फुट एवं लंबाई 72 फुट है।  राष्ट्रीय ध्वज का कुल वजन 40 किलोग्राम है।

तिरंगे की अलग-अलग कहानियां :-

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जयपुर में सबसे बडा राष्ट्रीय ध्वज
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष सांसद नवीन जिंदल ने  24 अक्टूबर 2011 को जयपुर के सेंट्रल पार्क में सबसे बड़ा ध्वज (72×48 फुट आकार का) को दो सौ छह फुट ऊंचे राष्ट्रीय ध्वजस्तंभ को स्थापित किया गया।

 फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष सांसद नवीन जिंदल ने कहा कि राष्ट्रीयता को बढ़ावा देने के लिए सबसे बडा और सबसे ऊंचा ध्वज लगाने का फैसला लिया गया। उन्होंने कहा कि सबसे ऊंचा और बडा राष्ट्रीय ध्वज जयपुर आने वाले देशी और विदेशी पर्यटकों के लिए तथा विशेष रूप से बच्चों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहेगा।

जिंदल के अनुसार, फाउडेंशन की ओर से ब्रह्मसरोवर (कुरुक्षेत्र), लाडवा, हिसार, सोनीपत, कैथल (हरियाणा), अंगुल (उड़ीसा), नेशनल मिलिटरी म्यूजियम (बेंगलुरु) और जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड विजयनगर (कर्नाटक) में दो सौ छह फुट ऊंचे ध्वज स्तंभ स्थापित किए जा चुके हैं और त्रिवेन्द्रम में इस पर काम चल रहा है। फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया और जयपुर विकास प्राद्यिकरण की ओर से स्थापित स्मरणार्थक राष्ट्रीय ध्वज को 206 छह फुट ऊंचे विशेष ध्वज स्तंभ पर स्थापित किया गया है और यह राष्ट्रीय ध्वज निटेड पोलिस्टर से बना हुआ है।
वाराणसी- तिरंगे से चल रहा है घर का चूल्हा… उत्तरप्रदेश के वाराणसी के लल्लापुरा निवासी मुहम्मद वसी के सामने अब न तो रोजगार का संकट है और न ही पहचान की। यहां साड़ी उद्योग में आई मंदी के कारण मुहम्मद वसी का परिवार बेरोजगारी की मार झेल रहा था, लेकिन अब वे तिरंगा बुन रहे हैं, जिससे उसकी बेरोजगारी तो दूर हुई ही, साथ ही इनकी अलग पहचान भी बनी है।

देशभक्ति के साथ रोजगार को जोड़ने वाले अकेले केवल वसी का ही परिवार नहीं है बल्कि वाराणसी में ऐसे लगभग दस परिवार हैं, जिनके घर का चूल्हा इसी तिरंगे से चल रहा है। रेशम पर बनने वाला यह तिरंगा अब सभी वर्ग के लोगों के लिए बनने लगा है। कागज के तिरंगे की जगह अब यह तिरंगा दुपट्टे के रूप में तैयार किए जा रहे हैं।

जानकारी के अनुसार मुहम्मद वसी अपने हैंडलूम पर केवल भारत में बने रेशम से ही तिरंगा झंडे बुनते हैं, क्योंकि वसी महसूस करते हैं कि तिरंगा तैयार करना उनके रोजगार का जरिया जरूर है, लेकिन यह भारत की शान का भी प्रतीक है।
पटना- 47 बरस से एक ही परिवार बांध रहा है तिरंगा… बिहार में राजधानी पटना के गांधी मैदान में गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर होने वाले ध्वजारोहण में एक परिवार का खास योगदान है। यह परिवार पिछले 47 साल से ध्वजारोहण के लिए तिरंगा बांधता आ रहा है।

 बिहार पुलिस के तत्कालीन हवलदार मुनेश्वर दास ने ध्वज बांधने का कार्य वर्ष 1965 में शुरू किया था और अपने जीवन के अंतिम क्षण तक वह इसे करते रहे। मुनेश्वर ने वर्ष 2010 तक स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर गांधी मैदान में होने वाले मुख्य राजकीय समारोह स्थल पर राष्ट्रीय ध्वज बांधने की जिम्मेदारी निभाई। दास की मृत्यु पिछले वर्ष 15 जनवरी हो गई थी। 

अब यह जिम्मेदारी उनके भतीजे बिन्दा दास निभा रहे हैं। अधिकारियों का भी मानना है कि यदि मुनेश्वर झंडा न बांधे तो काम अधूरा ही माना जाता था। एक अधिकारी के अनुसार, पिछले वर्ष गणतंत्र दिवस से पहले मुनेश्वर अपनी बीमारी के इलाज के लिए राज्य से बाहर गए थे, लेकिन मौत से जंग वह जीत नहीं पाए और 26 जनवरी से पहले ही उनकी मौत हो गई।

 समस्तीपुर जिले के पाहेपुर गांव निवासी मुनेश्वर ने बिहार पुलिस में सिपाही पद से अपनी नौकरी शुरू की थी। उत्कृष्ट सेवा के लिए उन्हें दो बार राष्ट्रपति पदक से भी सम्मानित किया गया था।
कुछ अलग है जयपुर के इस परिवार के लिए तिरंगा फहराने का महत्त्व… राजस्थान के गुलाबी नगर में एक परिवार से तिरंगे का रिश्ता ही कुछ खास है।कुछ अलग है इस परिवार और तिरंगे की कहानी और कुछ अलग है इस परिवार के लिए तिरंगा फहराने का महत्त्व।

जयपुर में रहने वाला यह परिवार अटल परिवार के नाम से जाना जाता है,  इस परिवार में है एक खास तिरंगा झंडा।वैसे तो इस तिरंगे में भी लाल, हरे और सफेद रंग की तीन पट्टियां और बीच में अशोक चक्र है, फिर भी यह तिरंगा अपने आपमें कुछ खास महत्व रखता है। इस तिरंगे से जुड़ी है बहादुरी की एक कहानी।यह कहानी जयकुमार अटल और तिरंगे की।यह कहानी है वीरता की एक मिसाल की और यह कहानी है सच्ची देशभक्ति की। बात 1971 की है, जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा हुआ था।

उस समय जयपुर के जय कुमार अटल पकिस्तान में भारत के हाई कमिश्नर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे।यह सभी जानते हैं कि इस युद्ध में पाकिस्तान को बुरी तरह हार का मुंह देखना पड़ा था। अपनी हार से पाकिस्तान पूरी तरह बौखला उठा और उसी बौखलाहट में कुछ पाकिस्तानियों ने वहां तिरंगे को जलाने का प्रयास किया।जब जय कुमार अटल ने यह देखा तो अपनी वीरता का परिचय देते हुए उन्होंने तिरंगा उन पाकिस्तानियों से छीन लिया और उसे लेकर भारत आ गए। 

तिरंगा लेकर जब वे भारत पहुंचे तो सर्व प्रथम उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से मुलाक़ात की और तिरंगा उन्हें सौंपना चाहा लेकिन श्रीमती गांधी ने तिरंगा लेने से इनकार कर दिया और तिरंगा जय कुमार को अपने साथ ले जाने को कहा। श्रीमती गांधी ने तिरंगा जयकुमार को वापस करते हुए कहा कि इस तिरंगे की लाज आपने बचाई है, इसलिए आज से यह तिरंगा आपके परिवार के पास ही सुरक्षित रहेगा, साथ ही हर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर आपके परिवार में ही इसे फहराया जाएगा।

 तब से जयपुर के अटल परिवार में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस दोनों ही एक त्यौहार की तरह मनाये जाते हैं जिसमें परिवार के सभी सदस्य चाहे वे जयपुर से बाहर ही क्यों न बसते हों, एक साथ इस तिरंगे को फहराते हैं।यहां तक कि जय कुमार अटल की पोती देविका तनखा जो US में रहती हैं, वे भी इस खास पर्व पर जयपुर पहुंच जाती है।
दुनिया के सात महाद्वीपों के सात सर्वोच्च शिखरों पर तिरंगा लहराने वाली महिला महिला साहस की अद्वितीय मिसाल बन चुकीं जमशेदपुर की महिला पर्वतारोही प्रेमलता अग्रवाल ने दुनिया के सात महाद्वीपों के सर्वोच्च शिखर पर तिरंगा लहराने का अनूठा कारनामा कर दिखाया है और यह उपलब्धि हासिल करने वाली वह पहली भारतीय महिला हैं। 50 वर्षीय और दो बेटियों की मां प्रेमलता ने गत 23 मई 2013 को उत्तरी अमेरिका के अलास्का स्थित सर्वोच्च शिखर माउंट मैककिनले (6194मी) को फतह किया और इसके साथ ही उन्होंने सात महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर पहुंचने का अद्भुत रिकार्ड बना दिया।

यूं शुरू हुआ सफर… प्रेमलता का सात महाद्वीपों की शीर्ष चोटियों को फतह करने का रोमांचक सफर छह जून 2008 को अफ्रीका में किलिमंजारो (5895 मीटर) पर जीत हासिल करने के साथ शुरू हुआ था। प्रेमलता ने फिर 20 मई 2011 को एशिया और दुनिया के सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट (8848 मी) को फतह किया। पद्मश्री से सम्मानित प्रेमलता ने 10 फरवरी 2012 को दक्षिण अमेरिका के एकोनकागुआ (6962 मी), 12 अगस्त 2012 को यूरोप के एल्ब्रास (5642 मी), 22 अक्तूबर 2012 को ऑस्ट्रेलिया ओसनिवा के कार्सटेंस पिरामिड (4884 मी), 5 जनवरी 2013 को आंटार्टिका के विनसन मैसिफ (4892 मी) और 23 मई 2013 को उत्तरी अमेरिका के माउंट मैककिनले (6194 मी) को फतह किया।
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आजादी से जुड़े चंद लम्हों की दास्तां कहता मेरठ का तिरंगा… आजादी के समय की तमाम धरोहरें संग्राहलयों में संजोई गई हैं। जिसमें आजादी के समय के तमाम ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं। आजादी से जुड़े चंद लम्हों को एक धरोहर के रुप में मेरठ में भी रखा गया है। 23 नवंबर 1946 में आजादी के पहले मेरठ के विक्टोरिया पार्क में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन के दौरान फहराया गया 14 फीट चौड़ा और 9 फीट लंबा तिरंगा फहराया गया था।

 यह झंडा हस्तिनापुर निवासी देव नागर के पास किसी धरोहर से कम नहीं है। इस ऐतिहासिक झंडे से देश के महत्वपूर्ण लोगों की यादें जुड़ीं हैं। जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु, शहनवाज खान, आचार्य कृपलानी और सुचेता कृपलानी के नाम झंडे के इतिहास से जुड़े हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में आजाद हिंद फौज के मलाया डिवीजन के कमांडर रहे, स्व कर्नल गणपत राम नागर के परिवार के लिए यह झंडा किसी अमूल्य धरोहर से कम नहीं है। गॉडविन पब्लिक स्कूल में उपप्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत देव नागर स्व कर्नल गणपत राम नागर के पौत्र हैं। 

वे बताते हैं कि आजादी के पहले विक्टोरिया पार्क में इस तिरंगे को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, जनरल शहनवाज खान, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य जेबी कृपलानी  और सुचेता कृपलानी के हाथों फहराया गया था। झंडारोहण के दौरान साथ में गणपत राम नागर भी मौजूद थे। गणपत राम नागर के पौत्र देव नागर कहते हैं कि मेरे पिता स्व सूरज नाथ नागर कहते थे कि ‘दादा से विरासत में मिला यह तिरंगा मेरे लिए देश की आजादी से जुड़ी धरोहर है। विक्टोरिया पार्क में यह झंडा जब फहराया जा रहा था, उस वक्त मैं वहां अपने पिता के साथ मौजूद था।

सबसे अधिक बार तिरंगा फहराने वाले प्रधानमंत्री :-

लाल किले की प्राचीर से लगातार नौवीं बार तिरंगा फहराने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सबसे अधिक बार झंडा फहराने वाले वजीर-ए-आजम की कतार में जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद तीसरे स्थान पर हैं। वह नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के सबसे अधिक बार ध्वजारोहण करने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं। मनमोहन, नेहरू और इंदिरा के बाद देश में तीसरे सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री रहने का गौरव हासिल कर चुके हैं।
  • नेहरू ने सबसे अधिक 17 बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्र ध्वज फहराया है। नेहरू ने देश को आजादी मिलने के दिन से लगातार 1963 तक हर 15 अगस्त पर तिरंगा फहराया।
  • इसके बाद उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने देश की प्रधानमंत्री के रूप में 16 बार तिरंगा फहराने का गौरव हासिल किया। इंदिरा गांधी ने 1966 से 1976 तक और फिर 1980 से 1984 तक ध्वजारोहण किया।
  • सिंह 2004 में देश के प्रधानमंत्री बने थे और उसी साल उन्हें पहली बार तिरंगा फहराने का गौरव प्राप्त हुआ था। इसके बाद वे लगातार नौ बार तिरंगा फहरा चुके हैं। 15 अगस्त 2013 को 10 बार वो तिरंगा फहराएंगे।
  • अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 से 2003 तक लगातार 6 बार लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहराया।
  • राजीव गांधी ने 1985 से 1989 तक पांच बार ध्वजारोहण किया।
  • पीवी नरसिंह राव ने 1991 से 1995 तक पांच बार तिरंगा फहराया।

पहली बार तिंरगा ऐवरेस्ट, अंतरिक्ष और विदेशी जमीन पर फहराया गया :-

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Mount Everest- The Indian flag was hoisted on the highest mountain peak of the world, Mount Everest on 29th May 1953.

Space- The Indian National Flag flew to space in 1984 when Wing Commander Rakesh Sharma went to the space. The flag was attached as a medallion on the space suit of Rakesh Sharma.
Foreign Soil- Madam Bhikaji Rustom Cama was the first person to hoist Indian flag on foreign soil on 22nd August 1907 in Stuttgrat, Germany. कांग्रेस का लम्बे समय तक कोई निजी झंडा नहीं था। कांग्रेस के अधिवेशन में यूनियन जैक को फहराकर भारत के अंग्रेज भगत प्रसन्न हो जाते थे। 1906 में कोलकता में कांग्रेस के अधिवेशन में भगिनी निवेदिता ने सबसे पहले वज्र अंकित झंडे का निर्माण किया जिस पर वन्दे मातरम लिखा हुआ था। उसके बाद 22 अगस्त 1908 को जर्मनी के स्टुअर्ट नगर में मैडम बीकाजी कामा ने वन्दे मातरम गीत के बाद राष्ट्रीय झंडा फहराया जिस पर वन्दे मातरम अंकित था। अपने भाषण में मैडम कामा ने पहले अंग्रेजों द्वारा भारत में किये जा रहे अत्याचारों का विवरण दिया जिससे की सुनने वालो के रोंगटे खड़े हो गए। उसके बाद भारत का झंडा निकालती हुई वह बोली यह हैं भारतीय राष्ट्र का स्वतंत्र झंडा। यह देखिये फहरा रहा हैं। भारतीय देश भक्तों के रक्त से यह पवित्र हो चूका हैं। सदस्यगन, मैं आपसे अनुरोध करती हूँ की आप खड़े होकर भारत की इस स्वतंत्र पताका का अभिवादन करे।

15 अगस्त 2012- सुनीता विलियम्‍स ने अंतरिक्ष में फहराया तिरंगा:-

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पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा है. सिर्फ देश के कोने कोने में ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में भी तिरंगा लहरा रहा है. जी हां, धरती से लाखों किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में सुनीता विलियम्स ने स्पेस स्टेशन में आजादी का जश्न मनाया. जब देश अपने लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार मना रहा है तब हिंदुस्तान की एक बेटी अंतरिक्ष से बधाई दे रही है. सुनीता विलियम्स ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में तिरंगा लगाकर आजादी का जश्न मनाया. अंतरिक्ष स्टेशन से सुनीता धरती को देख रही हैं और धरती पर उन्हें तलाश है भारत की. सुनी‍ता ने कहा धरती यहां से बहुत खूबसूरत दिखाई पड़ रही है, फिलहाल बादल हैं. समंदर भी दिखाई पड़ रहे हैं. लेकिन अफसोस यहां से भारत नहीं दिखाई पड़ रहा है.

चाँद पर पहुंचा तिरंगा :-

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भारत के लिए 2008 एक फलदायी साल रहा है। राजनीति से लेकर तकनीक तक भारत ने अगर कुछ खोया है तो दूसरी ओर बड़ी उपलब्धियाँ भी हासिल की हैं। 15 नवंबर 2008 को चंद्रमा की सतह पर जैसे ही भारतीय ध्वज लहराने की सूचना देशवासियों को मिली उनका ‍सिर फर्ख से ऊँचा हो गया। चंद्र अभियानों के इतिहास में देश की इस शानदार उपलब्धि ने भारत को उन देशों की सूची में शामिल कर दिया है जो चाँद को छूने का इतिहास कायम कर चुके हैं।

 जाने-माने भारतीय गणितज्ञ आर्य भट्ट ने 1500 साल पहले चाँद की दूरी तथा उसके आकार को सटीक तौर पर मापा था। 2008 में पीएसएलवी सी-11 के जरिये चंद्रयान-1 के प्रक्षेपण से आर्य भट्ट की खोज साकार हो गई है। यह सिर्फ इसरो के लिए ही नहीं पूरे देश के लिए एक बड़ी सफलता है। भारत ने पहली बार चाँद की जमीनी हकीकत जानने के लिए अपना मून मिशन चंद्रयान-1 आंध्रप्रदेश के श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र के सतीश धवन स्पेस सेंटर से रवाना किया।

 श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से यूकेलिप्टस के झुरमुटों से हवा को चीरता पीएसएलवी सी-11 जब आकाश की ओर बढ़ा तो भारत सफलतापूर्वक चंद्र अभियान भेजने वाला विश्व का छठा देश बन गया। इसकी सफलता के साथ ही भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश बन गया है, जिसने चाँद पर अपना नेशनल फ्लैग भेजा है। चाँद की जमीन पर चंद्रयान को पहुँचने में 15 दिनों का समय लगा।

Flags used by the Indian independence movement :-

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Military flags :-

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बॉलीवुड पर छाया तिरंगे का रंग… देशभक्ति के गीतों में तिरंगा…:-

भारतीय सिनेमा जगत में देश भक्ति से परिपूर्ण फिल्मों और गीतो की एक अहम भूमिका रही है और इनके माध्यम से फिल्मकार दर्शकों में देशभक्ति के जज्बे को आज भी बुलंद करते है।
चल चल रे नौजवान…‘ 
निर्देशक ज्ञान मुखर्जी की वर्ष 1940 में प्रदर्शित फिल्म ‘बंधन’ संभवत: पहली फिल्म थी, जिसमें देश प्रेम की भावना को रूपहले परदे पर दिखाया गया था। यूं तो फिल्म ‘बंधन’ मे कवि प्रदीप के लिखे सभी गीत लोकप्रिय हुए लेकिन चल चल रे नौजवान… के बोल वाले गीत ने आजादी के दीवानों में एक नया जोश भरने का काम किया।
आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है……

वर्ष 1943 में देश प्रेम की भावना से ओत प्रोत फिल्म ‘किस्मत’ प्रदर्शित हुई। फिल्म में प्रदीप के लिखे गीतआज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ए दुनियां वालो हिंदुस्तान हमारा हैने जहां एक ओर स्वतंत्रता सेनानियों को झकझोरा वहीं अंग्रेजों की तिरछी नजर के भी वह शिकार हुए। कवि प्रदीप का यह गीत अंग्रेज सरकार पर सीधा प्रहार था। 

कवि प्रदीप के क्रांतिकारी विचार को देखकर अंग्रेज सरकार द्वारा गिरफ्तारी का वारंट निकाला गया। गिरफ्तारी से बचने के लिये कवि प्रदीप को कुछ दिनों के लिये भूमिगत रहना पड़ा। कवि प्रदीप का लिखा यह गीत इस कदर लोकप्रिय हुआ कि सिनेमा हॉल में दर्शक इसे बार बार सुनने की ख्वाहिश करने लगे और फिल्म की समाप्ति पर दर्शकों की मांग पर इस गीत को सिनेमा हॉल मे दुबारा सुनाया जाने लगा। 

इसके साथ ही फिल्म ‘किस्मत’ ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकार्ड तोड़ दिये और इस फिल्म ने कोलकाता के एक सिनेमा हॉल मे लगातार लगभग चार वर्ष तक चलने का रिकार्ड बनाया।
ऐ मेरे वतन के लोगो….

यूं तो भारतीय सिनेमा जगत में वीरों को श्रद्धांजलि देने के लिए अब तक न जाने कितने गीतों की रचना हुई है लेकिन ऐ मेरे वतन के लोगो जरा आंखो मे भर लो पानी जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी जैसे देश प्रेम की अदभुत भावना से ओत प्रोत रामचंद्र द्विवेदी उर्फ कवि प्रदीप के इस गीत की बात ही कुछ और है।
वंदे मातरम्..‘ 
वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘आनंद मठ’ का अभिनेत्री गीताबाली पर लता मंगेशकर की आवाज में फिल्माया गीत ‘वंदे मातरम्.. आज भी दर्शकों और श्रोताओं को अभिभूत कर देता है।
ये देश है वीर जवानो का‘ 

आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी ने कई फिल्मों में देशभक्ति से परिपूर्ण गीत गाए हैं। इन गीतों में कुछ हैं ‘ये देश है वीर जवानो का’
वतन पे जो फिदा होगा अमर वो नौजवान होगा‘, 
अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नही,’ 
उस मुल्क की सरहद को कोई छू नही सकता जिस मुल्क की सरहद की निगाहबान है आंखे‘,
आज गा लो मुस्कुरा लो महफिले सजा लो‘ ,
हिंदुस्तान की कसम ना झुकेंगे सर वतन के नौजवान की कसम‘,
 मेरे देशप्रेमियो आपस में प्रेम करो देशप्रेमियो
ऐ मेरे प्यारे वतन
प्रेम धवन भी ऐसे गीतकार रहे है, जिनके ऐ मेरे प्यारे वतन‘,मेरा रंग दे बसंती चोला‘, 


ऐ वतन ऐ वतन तुझको मेरी कसम,
जैसे देशप्रेम की भावना से ओत प्रोत गीत आज भी लोगो के दिलो दिमाग में देश भक्ति के जज्बे को बुलंद करते हैं।
छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी‘ 

वर्ष 1961 में प्रेम धवन की एक और सुपरहिट फिल्म ‘हम हिंदुस्तानी’ प्रदर्शित हुई, जिसका गीत छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी सुपरहिट हुआ।
ऐ वतन ऐ वतन…‘ 

वर्ष 1965 में निर्माता -निर्देशक मनोज कुमार के कहने पर प्रेम धवन ने फिल्म ‘शहीद’ के लिए संगीत निर्देशन किया। यूं तो फिल्म
शहीद के सभी गीत सुपरहिट हुये लेकिन ‘ऐ वतन ऐ वतन…‘ और मेरा रंग दे बंसती चोला.. आज भी श्रोताओं के बीच शिद्दत के साथ सुने जाते है।
कर चले हम फिदा जानों तन….. 

भारत-चीन युद्ध पर बनी चेतन आंनद की वर्ष 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘हकीकत’ भी देश भक्ति से परिपूर्ण फिल्म थी। मोहम्मद रफी की आवाज में कैफी आजमी का लिखा यह गीत कर चले हम फिदा जानों तन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों.. आज भी श्रोताओं में देशभक्ति के जज्बें को बुलंद करता है।
जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा…..
इसी तरह गीतकारो ने कई फिल्मों में देशभक्ति से परिपूर्ण गीत की रचना की है इनमें 
  • जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा‘,
  • ऐ वतन ऐ वतन तुझको मेरी कसम‘,
  • नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं‘,
  • है प्रीत जहां की रीत सदा मैं गीत वहां के गाता हूं‘,
  • मेरे देश की धरती सोना उगले‘,
  • हर करम अपना करेगे ऐ वतन तेरे लिए‘,
  • भारत हमको जान से भी प्यारा है‘,
  • ये दुनिया एक दुल्हन के माथे की बिंदिया ये मेरा इंडिया‘, 
  • सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है‘,
  • फिर भी दिल है हिंदुस्तानी‘,
  • जिंदगी मौत ना बन जाये संभालो यारो,
  • मां तुझे सलाम‘,
  • थोड़ सी धूल मेरी धरती की मेरी वतन की‘ 

भारतीय ध्वज, स्वतंत्र भारत की पहली डाक टिकट, 21 नवम्बर 1947 को विदेशी पत्राचार के लिए जारी की गयी।

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1983 World Cup Finals
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2007 World Cup t20 Finals :-
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2011 cricket world cup :-
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CWG 2010 Opening :-
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2012 Olympics :-
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Indian flag atop Everest :-
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rajiv Prime-Minister-of-the-nation-Morarji-Desai-left-hoists-the-national-flag-to-mark-the-30th-anniversary-of-Independence-Day-at-the-rampant-of-Red-Fort-in-New-Delhi-on-August-15-1977- Picture19 Picture18 Picture14 Picture13 morarji Lal-Bahadur-Shastri Indira-Gandhi 6ded56c4-ce5f-4916-9dc6-e84802c4c25aHiRes drass1 Picture22 Picture25 Picture24 


संकलन साभार : कीबोर्ड के पत्रकार

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