लखनऊ : हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने भारत के संविधान में प्रदत्त हिंदी भाषा के लिए आयोग बनाए जाने सम्बंधी एक पुनर्विचार याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। इसके पूर्व दिसम्बर 2014 में उक्त याचिका खारिज हो गई थी जो जनहित याचिका के तौर पर दाखिल की गई थी।

जिसके बाद जनवरी 2015 में उक्त पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई।शैलेंद्र कुमार उपाध्याय की ओर से दाखिल उक्त याचिका में संविधान के अनुच्छेद- 344 (1) के प्रावधानों को पूरी तरह लागू किए जाने की मांग की गई है।

जिसमें संविधान के प्रारम्भ से पांच वर्ष की समाप्ति पर और इसके बाद दस वर्ष की समाप्ति पर एक आयोग गठित किए जाने का निर्देश है जो अनुच्छेद- 344 (2) के अनुसार राष्ट्रपति को संघ के शासकीय कार्यों के लिए हिंदी भाषा के अधिकाधिक प्रयोग और संघ के सभी या कुछ शासकीय कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग पर निर्बंधन के सम्बंध में सिफारिश करेगा।

पूर्व में याचिका को न्यायालय ने खारिज कर दिया था।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि 7 जून 1955 को यह आयोग बना दिया गया था जिसने 31 जुलाई 1956 को अपनी रिपोर्ट भी दे दी थी। 30 सदस्यीय संसदीय समिति ने उक्त रिपोर्ट का परीक्षण भी किया था जिसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति ने इसे दृष्टिगत रखते हुए 27 अप्रैल 1960 को आवश्यक आदेश भी पारित कर दिए थे।

इसके बाद नई स्थिति व नए तथ्य न आने पर दस साल बाद वाले आयोग का गठन नहीं किया गया। न्यायालय ने तब याचिका खारिज करते हुए कहा था चूंकि अगले आयोग का गठन न करने का निर्णय लिया गया लिहाजा न्यायालय याची की मांग के सम्बंध में कोई राहत नहीं दे सकती।

याची ने उक्त आदेश पर पुनर्विचार के लिए जनवरी 2015 में याचिका दाखिल की। जिस पर न्यायालय ने केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने के आदेश दिए हैं। मामले की अग्रिम सुनवाई 27 अप्रैल को होगी।

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