राज्य ब्यूरो, इलाहाबाद : नियमों को ताक पर रखकर शिक्षकों की फर्जी नियुक्तियां करने वाले अफसर की कार्यशैली पर बर्खास्तगी की कार्रवाई भी लगाम न लगा सकी। शिक्षा महकमे में अपनी पहुंच और पैसे के दम पर उसे मलाईदार कुर्सी भी मिलती रही। बड़े पद पर तैनाती के बाद भी मनमानी कार्यशैली नहीं बदली

पहले प्राथमिक और बाद में माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की फर्जी नियुक्तियां कर डालीं। पानी सिर से ऊपर हुआ, तब उप्र लोकसेवा आयोग इलाहाबाद ने दोबारा उसकी बर्खास्तगी का अनुमोदन कर दिया। हाईकोर्ट ने भी अफसर को बर्खास्त करने का आदेश दिया, लेकिन नौकरशाही ने सख्त कार्रवाई करने के बजाय उसका तबादला कर दिया है।

ये अफसर कोई और नहीं बलिया के निवर्तमान प्रभारी जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआइओएस) रमेश सिंह हैं, जिनका गुरुवार को बलिया से वरिष्ठ प्रवक्ता डायट सुलतानपुर के पद पर तबादला किया गया है।

शिक्षा महकमे में अलग कार्यशैली के लिए ये शुरू से चर्चित रहे हैं। शायद इसीलिए उन्हें 24 मार्च 2003 और फिर 28 जुलाई 2005 में अलग-अलग वजहों से निलंबित किया गया। रमेश सिंह 2007 में जब बस्ती में बेसिक शिक्षा अधिकारी रहे, उस दौरान उन्होंने प्राथमिक स्कूलों में बड़ी संख्या में शिक्षकों की फर्जी नियुक्तियां कर दीं।

यह प्रकरण इतना तूल पकड़ा कि उप्र लोकसेवा आयोग ने 21 अप्रैल 2008 को उन्हें महकमे से बर्खास्त करने का अनुमोदन कर दिया। खास बात यह है कि रमेश सिंह के अलावा चार अन्य बेसिक शिक्षा अधिकारियों को भी ऐसी ही शिकायतों पर बर्खास्त करने का अनुमोदन आयोग की ओर से हुआ।

बाकी चार अफसर इस कार्रवाई के बाद हाशिये पर चले गये, लेकिन रमेश सिंह ने हाईकोर्ट में एक के बाद एक कई याचिकाएं दाखिल कीं। तीन फरवरी 2010 को रमेश सिंह को बर्खास्तगी के आदेश पर स्थगनादेश हासिल हो गया। इसके बाद रमेश अपने अंदाज में कई जिलों में अहम पदों पर रहकर कार्य करते रहे।

शिक्षा महकमे में ‘ख’ वर्गीय अफसर होते हुए भी उन्हें सपा सरकार में बलिया जैसे जिले में ‘क’ वर्गीय पद पर प्रभारी जिला विद्यालय निरीक्षक के रूप में नियुक्ति मिली। यहां भी रमेश सिंह ने अपनी शैली में कामकाज जारी रखा। इस दौरान उन्होंने माध्यमिक विद्यालयों में बड़ी संख्या में फर्जी नियुक्तियां कर डालीं और यह प्रकरण नये सिरे से हाईकोर्ट पहुंच गया।

बीते दो जून 2017 को उप्र लोकसेवा आयोग ने दोबारा रमेश सिंह की बर्खास्तगी का अनुमोदन करके शासन को भेज दिया। इसी बीच एक याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने भी सरकार को निर्देश दिया कि रमेश सिंह को बर्खास्त कर दिया जाए।

आरोप है कि बर्खास्त होने के बाद भी रमेश सिंह ने एक सौ से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति का अनुमोदन दे दिया है, जबकि वह शिक्षक फर्जी हैं।राज्य ब्यूरो, इलाहाबाद : नियमों को ताक पर रखकर शिक्षकों की फर्जी नियुक्तियां करने वाले अफसर की कार्यशैली पर बर्खास्तगी की कार्रवाई भी लगाम न लगा सकी। शिक्षा महकमे में अपनी पहुंच और पैसे के दम पर उसे मलाईदार कुर्सी भी मिलती रही।

बड़े पद पर तैनाती के बाद भी मनमानी कार्यशैली नहीं बदली। पहले प्राथमिक और बाद में माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की फर्जी नियुक्तियां कर डालीं। पानी सिर से ऊपर हुआ, तब उप्र लोकसेवा आयोग इलाहाबाद ने दोबारा उसकी बर्खास्तगी का अनुमोदन कर दिया। हाईकोर्ट ने भी अफसर को बर्खास्त करने का आदेश दिया, लेकिन नौकरशाही ने सख्त कार्रवाई करने के बजाय उसका तबादला कर दिया है।

ये अफसर कोई और नहीं बलिया के निवर्तमान प्रभारी जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआइओएस) रमेश सिंह हैं, जिनका गुरुवार को बलिया से वरिष्ठ प्रवक्ता डायट सुलतानपुर के पद पर तबादला किया गया है। शिक्षा महकमे में अलग कार्यशैली के लिए ये शुरू से चर्चित रहे हैं। शायद इसीलिए उन्हें 24 मार्च 2003 और फिर 28 जुलाई 2005 में अलग-अलग वजहों से निलंबित किया गया।

रमेश सिंह 2007 में जब बस्ती में बेसिक शिक्षा अधिकारी रहे, उस दौरान उन्होंने प्राथमिक स्कूलों में बड़ी संख्या में शिक्षकों की फर्जी नियुक्तियां कर दीं। यह प्रकरण इतना तूल पकड़ा कि उप्र लोकसेवा आयोग ने 21 अप्रैल 2008 को उन्हें महकमे से बर्खास्त करने का अनुमोदन कर दिया।

खास बात यह है कि रमेश सिंह के अलावा चार अन्य बेसिक शिक्षा अधिकारियों को भी ऐसी ही शिकायतों पर बर्खास्त करने का अनुमोदन आयोग की ओर से हुआ। बाकी चार अफसर इस कार्रवाई के बाद हाशिये पर चले गये, लेकिन रमेश सिंह ने हाईकोर्ट में एक के बाद एक कई याचिकाएं दाखिल कीं।

तीन फरवरी 2010 को रमेश सिंह को बर्खास्तगी के आदेश पर स्थगनादेश हासिल हो गया। इसके बाद रमेश अपने अंदाज में कई जिलों में अहम पदों पर रहकर कार्य करते रहे।

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