राजीव दीक्षित ’ लखनऊ सरकारी स्कूलों में बेसिक शिक्षा के गिरते स्तर में सुधार लाने के लिए अब शिक्षकों को इसके लिए जवाबदेह बनाने की तैयारी है। इसके लिए पहली से लेकर आठवीं कक्षा तक के बच्चों से उनकी कक्षा के अनुरूप पढ़ाई को सीखने-समझने के अपेक्षित स्तर को मानक (लर्निग आउटकम्स) की शक्ल दी जाएगी।

साथ ही, इन मानकों को उत्तर प्रदेश निश्शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार नियमावली में शामिल किया जाएगा। इन मानकों को नियमावली में शामिल करने के पीछे मकसद यह है कि यदि बच्चे का ज्ञान और उसके सीखने-समझने का स्तर लर्निग आउटकम्स की कसौटी पर खरा नहीं उतरा तो इसके लिए शिक्षकों को कानूनी तौर पर जवाबदेह ठहराया जा सकेगा।

केंद्र के निर्देश पर बेसिक शिक्षा विभाग ने इस दिशा में कवायद शुरू कर दी है। परिषदीय स्कूलों की पढ़ाई हमेशा सवालों के घेरे में रही है। कई सर्वेक्षण अध्ययनों में इन स्कूलों के ज्यादातर बच्चों के सीखने-समझने का स्तर उनकी कक्षा के अनुरूप नहीं पाया गया है।

गैर सरकारी संस्था प्रथम की ओर से सालाना जारी की जाने वाली ऐनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट इन स्कूलों में शिक्षा की बदहाली को उजागर करती रही है। यह स्थिति तब है जब सरकार बेसिक शिक्षा पर अरबों रुपये बहा रही है, जिसका बड़ा हिस्सा शिक्षकों के वेतन पर खर्च हो रहा है।

इन स्कूलों में कक्षा एक से आठ तक का कोर्स तो निर्धारित है लेकिन, बच्चा उस कोर्स को सीख-समझ पा रहा है या नहीं, इसका अभी कोई मानक तय नहीं है। बच्चों को सिखाने-पढ़ाने के बारे में शिक्षकों को उत्तरदायी बनाने के उद्देश्य से अब केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रलय ने कक्षा एक से आठ तक के बच्चों के लिए लर्निग आउटकम्स को शिक्षा का अधिकार नियमावली में शामिल करने का फैसला किया है।

हाल ही में सीएम से मुलाकात में मानव संसाधन विकास मंत्रलय के सचिव अनिल स्वरूप ने उन्हें केंद्र की मंशा से अवगत कराया है। इससे पहले बेसिक शिक्षा विभाग के अफसरों के साथ बैठक में भी उन्होंने यह निर्देश दिया था।

इसके पीछे सोच यह है कि जब तक शिक्षकों को इसके लिए जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक सुधार नहीं होगा।

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